आरटीआई में जब मिले 'किस्से-कहानी' तो केवल अपील ही नहीं, मनमाने अधिकारी पर भी कसें शिकंजा!
आर.टी.आई. (RTI - सूचना का अधिकार) अधिनियम 2005 का मुख्य उद्देश्य सरकारी तंत्र से प्रमाणित दस्तावेज़ (Certified Documents), आधिकारिक आदेश और नोटिंग शीट्स की स्पष्ट व तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करना है। लेकिन जब जन सूचना अधिकारी (PIO) कानूनी प्रावधानों और दायित्वों को दरकिनार कर मांगी गई जानकारी के बदले केवल कहानियां लिखकर भेजने लगें, तो चुप रहने के बजाय ठोस प्रशासनिक कदम उठाना ज़रूरी हो जाता है।
ऐसा ही एक मामला महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (MGAHV) में सामने आया।
RTI में क्या मांगा था?
विश्वविद्यालय के मुख्य प्रशासनिक भवन के प्रवेश द्वारों पर 8 जुलाई 2026 से ताला लगाने/बंद रखने के संबंध में हमनें 5 बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी:
1. भवन बंद करने के आधिकारिक आदेश/सर्कुलर की प्रमाणित प्रति।
2. आदेश जारी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी का नाम व पद।
3. पूरी नोटिंग शीट और फाइल मूवमेंट रिकॉर्ड।
4. छात्र ज्ञापनों पर कार्रवाई रिपोर्ट (ATR)।
5. छात्रों की सुविधा के लिए की गई वैकल्पिक व्यवस्था के आधिकारिक आदेश।
PIO का गैर-व्यावसायिक जवाब
सर्टिफाइड प्रतियां या लिखित आदेश देने के बजाय PIO (डॉ. चंद्र शेखर पांडेय) ने जवाब में डफली बजाने, नारेबाजी करने और कुलपति के कार्यों में बाधा आने जैसी बातें लिखकर एक वर्णनात्मक उत्तर (Narrative Reply) प्रस्तुत कर दिया, जो RTI अधिनियम की धारा 7(1) का स्पष्ट उल्लंघन है।
मनमानी रोकने के लिए हमने क्या कदम उठाया?
1. प्रथम अपील (First Appeal) की तैयारी: नियमानुसार 30 दिनों के भीतर प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपील की प्रक्रिया तो जारी है ही।
2. शीर्ष प्रशासन (कुलपति) से शिकायत: केवल अपील तक सीमित न रहकर हमने विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति महोदया को लिखित शिकायत पत्र सौंपा।
3. PIO पद से हटाने की मांग: शिकायत में स्पष्ट किया गया कि जो प्राध्यापक PIO के पद पर रहकर प्रश्न की प्रकृति और मांगी गई जानकारी के अंतर को समझने में असमर्थ हैं, वे पद की प्रशासनिक गरिमा और वैधानिक नियमों (Statutory Compliance) को धूमिल कर रहे हैं। इसलिए RTI अधिनियम की धारा 5(1) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से PIO के दायित्व से मुक्त किया जाए और किसी प्रशिक्षित वरिष्ठ अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी जाए।
अब कार्रवाई का इंतजार!
कुलपति कार्यालय द्वारा इस आवेदन को 18/09/2026 को प्राप्त (Receive) कर लिया गया है। अब देखना यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस गैर-जिम्मेदाराना जवाब पर क्या कड़ा संज्ञान लेता है और पारदर्शिता बहाल करने के लिए क्या कार्रवाई करता है।
क्या विश्वविद्यालय में गवर्नेंस (प्रशासनिक व्यवस्था) का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब मांगे गए आधिकारिक रिकॉर्ड और सर्टिफाइड कॉपी की जगह कहानियां परोसी जा रही हैं? किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीआईओ (PIO) द्वारा इस तरह का गैर-व्यावसायिक रवैया अपनाना सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यशैली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
• जवाब न मिले तो हताश न हों: जब PIO दस्तावेज़ देने के बजाय कहानियां या सफाई दे, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उनके पास लिखित आदेश या सही रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं है!
• केवल अपील तक सीमित न रहें: यदि अधिकारी जानबूझकर सूचना छिपाने या भ्रामक जवाब देने के लिए मनमानी पर उतर आए, तो प्रथम अपील के साथ-साथ संस्था के सर्वोच्च प्रशासनिक प्रमुख को भी अधिकारी की अक्षमता के खिलाफ आवेदन दें।
• अधिकारों के प्रति सजग रहें: RTI कानून का उद्देश्य अधिकारियों की व्यक्तिगत टिप्पणियां सुनना नहीं, बल्कि ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेज़ प्राप्त करना है।
क्या आपके साथ भी RTI में ऐसा गोल-मोल जवाब मिलने का अनुभव हुआ है? कमेंट में अपनी राय ज़रूर साझा करें!
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