​श्री कादर नवाज खान का रातों-रात बदला डेटा, आखिर सच क्या है?

 जब भी किसी केंद्रीय या अंतरराष्ट्रीय संस्थान में प्रशासनिक विसंगतियों और व्यवस्थागत फर्जीवाड़े का पर्दाफाश होता है, तो आरोपी तंत्र अक्सर एक तयशुदा फॉर्मूले पर काम करता है—सच को दबाओ, डिजिटल डेटा बदलो और यह साबित करने की कोशिश करो कि यह तो महज एक 'टाइपिंग एरर' या 'क्लैरिकल मिस्टेक' थी।

​महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (MGAHV), वर्धा में इन दिनों यही खेल चल रहा है।

​हमारे स्वतंत्र खोजी मंच 'Student Voice' पर जैसे ही विधि विभाग (Law Department) के भीतर चल रहे 'कागजी सिंडिकेट', 75% फैकल्टी वैकेंसी, और RTI के दस्तावेजों व टाइम-टेबल की पोल खोलने वाली रिपोर्ट सामने आई, विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप मच गया। परिणाम आपके सामने है: रिपोर्ट आने के महज़ 24 घंटे के भीतर, प्रशासन ने क्या बिना किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण के बैकएंड पर चुपचाप खेल कर दिया?



​'पहले और बाद' के स्क्रीनशॉट्स और डिजिटल कवर-अप का सच

यदि प्रशासन पारदर्शी है, तो उसे सामने आकर यह बताना चाहिए कि यह बदलाव किस नियम के तहत हुआ?

  • पहले क्या था? विश्वविद्यालय के आधिकारिक वेब पोर्टल पर पूर्व कार्यवाहक कुलसचिव व वर्तमान वित्त अधिकारी श्री कादर नवाज खान का आधिकारिक विभाग 'विधि विभाग' (Department of Law) दर्ज था।

  • ​अब क्या कर दिया गया? जैसे ही इस 'घोस्ट प्रोफाइल' की पोल खुली, प्रशासन ने रातों-रात चुपके से पोर्टल पर उनकी प्रोफाइल एडिट करके विभाग का नाम बदलकर 'Administration' कर दिया।

यह इस बात का प्रत्यक्ष और अकाट्य सबूत (Smoking Gun) है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी गलती स्वीकार कर चुका है। उन्हें अच्छी तरह पता था कि RTI के जवाबों और वेबसाइट के डेटा का यह विरोधाभास उनकी पोल खोल रहा है। प्रशासन शायद यह सोच रहा है कि वेबसाइट पर एक लाइन बदल देने से यह घोटाला रफा-दफा हो जाएगा, लेकिन खेल यहीं से शुरू होता है!

अन्ना यूनिवर्सिटी से लेकर MGAHV तक: पकड़े जाने पर साक्ष्य मिटाने की पुरानी बीमारी

अकादमिक इतिहास गवाह है कि जब-जब बड़े संस्थानों की चोरी पकड़ी जाती है, वे डिजिटल साक्ष्य मिटाने की कोशिश करते हैं:

  1. अन्ना यूनिवर्सिटी (Anna University) का डिजिटल फ्रॉड: The New Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही मीडिया और आरटीआई एक्टिविस्टों ने संबद्ध कॉलेजों में 'घोस्ट फैकल्टी' और एक ही प्रोफेसर के कई जगह नाम होने का भंडाफोड़ किया, विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट से फैकल्टी रोस्टर और नामांकन का पूरा डेटा ही डिलीट कर दिया था। पूर्व कुलपतियों ने इसे जनता के साथ धोखा करार दिया था। ठीक उसी तर्ज पर MGAHV प्रशासन ने भी डिजिटल सैनिटाइजेशन का रास्ता चुना है।
  2. मेडिकल कॉलेज घोटाले और सीबीआई की रेड: देश के कई मानद विश्वविद्यालयों में सीबीआई की जांच से पहले बायोमेट्रिक अटेंडेंस और वेबसाइट प्रोफाइलों को रातों-रात संशोधित (Modify) करने के मामले सामने आ चुके हैं।

प्रशासन से हमारे सीधे सवाल

वेबसाइट पर नाम बदल लेने से विश्वविद्यालय के बुनियादी और गंभीर सवाल गायब नहीं हो जाते। प्रशासन को इन सवालों के जवाब देने होंगे:

  1. किसकी अनुमति से बदला गया डेटा? यदि श्री कादर नवाज खान शुरू से ही प्रशासन में थे, तो वर्षों तक वेबसाइट पर उनके नाम के आगे 'विधि विभाग' क्यों दर्ज था? क्या यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और यूजीसी (UGC) के निरीक्षणों में कागजी कोरम पूरा दिखाने के लिए किया गया एक सुनियोजित फर्जीवाड़ा था?
  2. नोट-शीट और लॉग रिपोर्ट सार्वजनिक हो: यदि यह महज़ एक 'क्लैरिकल मिस्टेक' थी, तो क्या प्रशासन इस बात का आधिकारिक आदेश, नोट-शीट और वेबसाइट का सिस्टम लॉग ट्रेल (System Log/Audit Trail) सार्वजनिक करने की हिम्मत दिखाएगा कि यह प्रोफाइल कब और किसके आदेश से बदली गई?
  3. बाकी विसंगतियों पर चुप्पी क्यों? यदि प्रशासन सच में पारदर्शी है, तो RTI के उन दस्तावेजों पर चुप्प क्यों है जिनमें जनसंचार विभाग के डॉ. संदीप कुमार वर्मा को विधि विभाग का शिक्षक बताया गया है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि वे लॉ विभाग में एक भी क्लास नहीं लेते?


  4. NIRF 2026 और 36 'घोस्ट स्टूडेंट्स' का क्या? विश्वविद्यालय की आंतरिक रिपोर्ट्स, 2024-25 के वार्षिक प्रतिवेदन (Annual Report) और NIRF 2026 के आंकड़ों में जो 36 संदिग्ध व फर्जी छात्र एंट्रीज पाई गई हैं, उसका जवाब कौन देगा?

दमन और उत्पीड़न के खिलाफ एक कड़ी चेतावनी (Pre-emptive Strike)

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों ने आरटीआई और दस्तावेजों के जरिए सच उजागर किया है, तो प्रशासन ने अपनी गलती सुधारने के बजाय आवाज उठाने वाले छात्रों के दमन (Whistleblower Retaliation) का रास्ता चुना है।

हम विश्वविद्यालय प्रशासन को बहुत स्पष्ट शब्दों में आगाह करना चाहते हैं: यह देश संविधान और कानून से चलता है। यदि तथ्यों, आरटीआई दस्तावेजों और अकाट्य डिजिटल स्क्रीनशॉट्स पर आधारित इस खोजी रिपोर्ट के बाद किसी भी छात्र, शोधार्थी या व्हिसलब्लोअर को अकादमिक या प्रशासनिक स्तर पर प्रताड़ित करने, डराने, उनके जीवन को खतरे में डालने या उनके करियर को प्रभावित करने का कोई भी प्रयास किया गया, तो इसे 'सच को दबाने का एक आपराधिक कृत्य' माना जाएगा।

इन तमाम साक्ष्यों, टाइम-स्टैम्पड स्क्रीनशॉट्स, आरटीआई जवाबों और वेब आर्काइव के सबूतों के साथ सीधे माननीय उच्च न्यायालय (High Court) और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) का दरवाजा खटखटाया जाएगा। यूजीसी और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि व्हिसलब्लोअर्स और छात्रों की सुरक्षा सर्वोपरि है।

निष्कर्ष: अब उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच की जरूरत

क्या वेबसाइट पर चुपचाप प्रोफाइल बदल देने से वे लिखित दस्तावेज बदल जाएंगे जो प्रशासन ने खुद अपने हस्ताक्षर के साथ आरटीआई में दिए हैं। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा जैसे अंतरराष्ट्रीय और केंद्रीय संस्थान में यदि इस स्तर की कागजी बाजीगरी और डेटा मैनिपुलेशन होने लगे, तो यह देश की वैश्विक छवि और उच्च शिक्षा की साख के लिए गंभीर खतरा है।

अब समय आ गया है कि किसी खानापूर्ति वाली आंतरिक जांच समिति के बजाय एक स्वतंत्र उच्च-स्तरीय या केंद्रीय एजेंसी (Independent High-Level Probe) से इस पूरे फर्जीवाड़े की जांच कराई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

सच को फाइलों में दफनाने की खौफनाक साजिश रची जा रही है! प्रशासन की इस संदिग्ध चुप्पी और छिपकर किए गए बदलावों ने साबित कर दिया है कि दाल में कुछ बहुत काला है। 

सत्यमेव जयते!

📢 MGAHV के छात्रों और शोधार्थियों के लिए विशेष संदेश!

क्या आप भी विश्वविद्यालय में किसी प्रशासनिक लापरवाही, हॉस्टल, मेस, पानी, लाइब्रेरी या फीस से जुड़ी समस्या से परेशान हैं? क्या आपको डर है कि आवाज़ उठाने पर आपको टारगेट किया जाएगा या आपका एकेडमिक रिकॉर्ड खराब कर दिया जाएगा?

आपको घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है!

हमने MGAHV के छात्रों के लिए एक 100% गोपनीय (Anonymous) स्टूडेंट वॉयस प्लेटफॉर्म बनाया है। आप अपनी समस्या और उससे जुड़े सबूत हमसे शेयर कर सकते हैं। आपकी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाएगी, और हम उस मुद्दे को RTI व आधिकारिक शिकायतों के ज़रिये प्रशासन तक पहुंचाएंगे।

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